सन् 2007 में मैं अपने पिताजी के साथ अयोध्या से विशाखापट्टनम के लिए निकला। यह कोई सामान्य यात्रा नहीं थी, बल्कि मेरे पैर के ऑपरेशन की यात्रा थी। बचपन से ही पैर की समस्या के कारण चलने-फिरने में कठिनाई होती थी, इसलिए मन में डर भी था और उम्मीद भी।
ट्रेन से सफर करते हुए हम हावड़ा स्टेशन पहुँचे। अगली ट्रेन आने में कुछ घंटे का समय था। इस दौरान मैंने प्रसिद्ध Howrah Bridge देखा। उसकी भव्यता ने मुझे बहुत प्रभावित किया। रास्ते में नारियल और केले के पेड़ों से भरे सुंदर दृश्य देखकर मन प्रसन्न हो गया।
जब हम विशाखापट्टनम पहुँचे, तो वहाँ की भाषा मेरे लिए नई थी, लेकिन लोगों का व्यवहार बहुत अच्छा था। अस्पताल में डॉक्टरों ने जाँच की और मेरा ऑपरेशन किया। ऑपरेशन के बाद कई दिनों तक दर्द रहा, लेकिन पिताजी हर समय मेरे साथ रहे। उनका सहयोग मेरे लिए सबसे बड़ी ताकत था।
एक दिन वापसी के सफर में एक किन्नर ने मेरे पैर की स्थिति देखकर मुझे आशीर्वाद दिया। उस घटना ने मुझे यह एहसास कराया कि दुनिया में संवेदनशील और दयालु लोग हर जगह मिल जाते हैं।
कुछ दिनों बाद मुझे अस्पताल से छुट्टी मिल गई और मैं घर लौट आया। एक महीने बाद फिर जाँच के लिए विशाखापट्टनम जाना पड़ा। इस बार मेरे साथ मम्मी-पापा दोनों थे। डॉक्टरों ने प्लास्टर काटा और कुछ सुधार दिखाई दिया। मैं अपने दाएँ पैर से पहले से बेहतर चलने लगा और थोड़ी-बहुत छलांग भी लगा पाता था।
लेकिन समय के साथ समस्याएँ फिर बढ़ीं। आगे चलकर मुझे आर्थिक और शारीरिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। बाद में पीजीआई में भी इलाज कराया, पर डॉक्टरों ने बताया कि पैर पूरी तरह पहले जैसा होना कठिन है। यह सुनकर दुख हुआ, लेकिन मैंने हार नहीं मानी।
आज भी मैं अपने जीवन को सकारात्मक सोच के साथ जी रहा हूँ। इस यात्रा ने मुझे सिखाया कि कठिनाइयाँ चाहे कितनी भी बड़ी हों, साहस, परिवार का साथ और ईश्वर में विश्वास इंसान को आगे बढ़ने की शक्ति देते हैं। मेरी कहानी संघर्ष की कहानी है, लेकिन उससे भी अधिक उम्मीद, धैर्य और हिम्मत की कहानी
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